Nadi Shodhana Kriya Pranayama | नाड़ी शोधन क्रिया प्राणायाम

दोस्तों आज का लेख नाड़ी शोधन क्रिया प्राणायाम (Nadi Shodhana Kriya Pranayama) के बारे में है। इस लेख में आप जान पायेंगे कि प्राणायाम करने से पूर्व नाड़ी शोधन क्रिया क्यों आवश्यक होता है। नाड़ी शोधन क्रिया की विधि, सावधानियाँ एवं लाभ क्या है? साथ ही आप यह भी जान पाएंगे की हटयोग में नाड़ी शोधन क्रिया प्राणायाम का क्या महत्व है।

नाड़ी शोधन – Nadi Shodhana Kriya in Hindi

प्राणायाम के पूर्व नाड़ी शुद्धि को आवश्यक माना गया है। Nadi Shodhana क्रिया का अभ्यास अपने शरीर के भीतर प्राण को चलाने की क्रिया है। यह क्रिया प्राण को जाग्रत करने की क्रिया है। लेकिन प्राण की जागृत और प्राणों का स्वतंत्र प्रवाह तभी संभव है जब हमारे भीतर की सभी नाड़ियाँ अवरोध रहित बन जाये।

हमारे शरीर में 72 हजार नाड़ियाँ है। इन नाड़ियों में किसी न किसी प्रकार अवरोध उत्पन्न होने से व्याधियाँ उत्पन्न होने लगती है। नाड़ियों के शुद्ध होने से रक्त का प्रवाह अबाध गति से समस्त शरीर में बहने लगता है। और उसकी चैतन्यता, स्फूर्ति, शक्ति पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ जाता है। नाड़ियों को अवरोध रहित करने के लिए नाड़ी शोधन क्रिया प्राणायाम विशेष रूप से प्रभावशाली होता है।

नाड़ी के प्रकार – Nadi Ke Prakar in Hindi

हमारे शरीर में अनेक नाड़ियाँ है जिस प्रकार हार में फूल गुथे रहते है। उसी प्रकार से ये नाड़ियाँ आपस में गुथी हुई और उलझी हुई होती है। इनकी उलझन से प्राणशक्ति के प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। अतः जब तक इन नाड़ियों का शुद्धिकरण न हो जाये, तब तक प्राणायाम का अभ्यास नहीं करनी चाहिए।

योग ग्रंथों में 72 हजार नाड़ियों का उल्लेख है। इनमें से 14 नाड़ियों को ही माना गया है, जिनमें 3 नाड़ियों को प्रमुख माना गया है। जो इस प्रकार है –

1- सुषुम्ना (Sushumna nadi)

2- इड़ा

3- पिंगला

4- गान्धरी

5- हस्तजिव्हा

6- कुहू

7- सरस्वती

8- पूषा

9- शंखिनी

10- यशस्विनी

11- वारुणी

12- अलम्बुसा

13- विश्वोधरा

14- पयस्विनी

नाड़ी शोधन के प्रकार – Nadi Shodhana Ke Prakar in Hindi

समनु और निर्मुन के भेद से नाड़ी शोधन के दो प्रकार है –

समनु – Types of Nadi Shodhana

बीज मंत्र के साथ होने वाले Nadi Shodhana की यह क्रिया मानसिक है। प्रारम्भ में साधक मानसिक रूप से श्वास का ख्याल रखते हुए श्वास के साथ अपनी चेतना को ऊपर नीचे लता ले जाता है। इसके बाद गहराई में जाने के लिए श्वास के साथ मंत्र का अभ्यास करते है।

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निर्मुन –Types of Nadi Shodhana

धौतिकर्म से होने वाले नाड़ी शोधन क्रिया शारीरिक है। धौति क्रिया से फेफड़े दोष रहित हो जाते है। आंतरिक अंग विकार रहित हो जाते है। तब प्राण की जागृति अपने आप होने लगती है। उस समय प्राण को केवल नाड़ी क्षेत्र में भेजने का प्रयास किया जाता है।

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नाड़ी शोधन की विधि – Nadi Shodhana Ki Vidhi in Hindi

 

Nadi Shodhana Kriya Pranayama

 

सबसे पहले ध्यान के किसी आसन जैसे- सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाये।

Nadi Shodhana के लिए अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर कर के बैठे।

दाहिने हाथ की उँगलियों तर्जनी और मध्यमा को भ्रू मध्य पर रखें।

अब अंगूठा दाहिने नासिकाछिद्र के ऊपर और अनामिका ऊँगली बायें नासिकाछिद्र के ऊपर रखें।

दाहिने नासिका छिद्र को बंद कर बाए से श्वास खींचे और धीरे धीरे नाभि चक्र तक ले जाए।

ध्यान करे कि नाभि स्थान में पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा के सामान पीतवर्ण शीतल प्रकाश विधमान है।

खींचा हुआ श्वास उसे स्पर्श कर रहा है।

जितने समय में श्वास खीचा गया है उतने ही समय तक भीतर रोके।

ध्यान करते रहे कि नाभिचक्र में स्थित पूर्ण चंद्र के प्रकाश का खीचा हुआ, श्वास स्पर्श करके उसे शीतल और प्रकाशवान बना रहा है।

अब वायी नासिका छिद्र से ही श्वास बाहर निकाले।

ध्यान करे कि नाभिचक्र के चन्द्रमा को छूकर वापस लौटने वाली प्रकाशवान एवं शीतल वायु इड़ा नाड़ी की छिद्र नलिकाओं को शीतल एवं प्रकाशवान बनाती हुई वापिस लौट रहा है।

श्वास छोड़ने की गति अत्यंत धीमी होनी चाहिए।

कुछ देर श्वास को बाहर रोककर रखे।

इसी तरह तीन तीन बार बाए नासिका छिद्र से श्वास खीचते और छोड़ते हुए नाभि चक्र में चन्द्रमा का शीतल ध्यान करे।

फिर तीन बार दाहिने नासिका छिद्र से श्वास खीचते छोड़ते हुए सूर्य के उष्ण प्रकाश का ध्यान करें।

अब दोनों नाशिका छिद्रों से एक बार श्वास को खींचते हुए मुख से श्वास को निकाल दे।

इस प्रकार Nadi Shodhana का एक चक्र पूरा हुआ।

प्रारम्भ में Nadi Shodhana Kriya Pranayama को तीन बार तक करें

जैसे जैसे अभ्यास में निपुणता होती जाये इसे 20 चक्रो तक किया जा सकता है।

नाड़ी शोधन क्रिया प्राणायाम के लाभ – Nadi Shodhana Kriya Pranayama Benefits

नियमित Nadi Shodhana का अभ्यास करते रहने से कुछ समय में ही सभी नाड़ियाँ मल रहित और शुद्ध हो जाती है।

व्यक्ति अपने शरीर में हल्कापन और साथ ही शक्ति की अधिकता का अनुभव करने लगता है।

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नाड़ी शोधन क्रिया प्राणायाम में सावधानियाँ – Nadi Shodhana Kriya Pranayama Precautions

इस प्राणायाम का अभ्यास ब्रह्ममुहर्त (प्रातः 4 से 6 के बीच) में ही करना चाहिये। दिन के समय इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।

जब वायु मन्द औश्र ठण्डी हो, न ज्यादा ठंड हो, न ज्यादा गर्मी, तब उस शीतल वायु में नाड़ी शोधन क्रिया प्राणायाम अभ्यास करना चाहिए।

बंद कमरे में Nadi Shodhana Kriya Pranayama का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

हमेशा खिड़िकी और दरवाजे खोलकर कर करे ताकि शुद्ध वायु का प्रवेश होता रहे।

इस बात का ध्यान रखे कि स्थान ज्यादा हवादार भी न हो कि कमरे के भीतर हवा का झोका लगे।

यदि वायु हल्की ठंडी है, तो चादर ओढ़ ले या कुछ कपड़े पहन ले।

शरीर को सीधे वायु के सम्पर्क में नहीं आने देना चाहिए।

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